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हमारी भागमभाग भरी जिंदगी

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हम सभी ने गोविंदा की फिल्म भागमभाग देखा ही होगा और जिन्होंने नहीं देखा है , वे एक बार तो इसे देख ही सकते हैं क्योंकि हमारी जिंदगी उन किरदारों से कम भी नहीं है। मैं गोविंदा का प्रशंसक हूँ लेकिन मैं इस आलेख में गोविंदा की प्रशंसा करने हेतु नहीं आया हूँ। मैंने केवल उस फिल्म का नाम लिया है क्योंकि इसका नाम जितना रोचक है , उतना ही नैसर्गिक भी है। यह शीर्षक हमें बताता है कि अगर यह किसी कहानी का नाम है तो इसका किरदार वाकई पूरी कहानी के दौरान एक जगह से दूसरे जगह भागता ही रहेगा । वह किसी तलाश में होगा या फिर कोई उसकी तलाश में होगा और इन दो मुख्य किरदारों के दम पर यह कहानी सरपट दौड़ती रहती है लेकिन मैं यहाँ केवल उन दोनों किरदारों का ही चित्रण नहीं करना चाहता हूँ। मैं अपने इस आलेख को नया आयाम देते हुए इसकी परिधि को वैश्विक करना चाहता हूँ। वैश्विक करने का तात्पर्य मात्र इतना है कि मैं विश्व के सभी नागरिकों को अपनी इस कहानी का किरदार बनाना चाहता हूँ। कुछ लोगों को ताज्जुब हो सकता है कि वे आखिर बेनामी रूप से ही सही लेकिन मेरी किसी कहानी का किरदार कैसे बन सकते...

अतरंगी सफर का साथ

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आज मैं फिर से अपने एक अनोखे व जादुई सफर पर निकल पड़ा हूँ और यह सफर भी थोड़ी अतरंगी है और यह मेरी रेलसफर है ।  मैं बेलुड़ गुरुवार को आया और आगामी बुधवार को सुबह साढ़े नौ बजे फोन आया कि मुझे तुरंत घर पहुँचना है। इसका कारण पूछने की जरूरत भी नहीं पड़ी क्योंकि पापा दस बार बात करने का असफल प्रयास (छुटी पुकार) कर चुके थे और माँ व बिपुल का भी इसी बीच बारी आ रही था। सुबह आखिरी वक्त में उठने पर मुझे बोला गया कि माँ की तबीयत खराब है और माँ मुझे खुद भी बोली कि उनको अच्छा नहीं लग रहा है। मैं हैरान था और थोड़ा परेशान भी था लेकिन सुबही आदत से मजबूर होने के कारण कुछ नहीं बोल पाया और तुरंत जाल से रेलसमय आदि की जानकारी लेकर माँ को वापस फोनकर बोल दिए कि मैं ढाई बजे तक आसन में रहूँगा और अगले दस मिनट में तरोताजा होकर निकल पड़ा। मुझे उस वक्त अपने पर गुस्सा आ रहा था कि पहले उन्होंने मुझे बेमर्जी यहाँ आने को बोल दिया और अब खुद ही माँ फोन करके बुला रही है लेकिन माँ की आवाज मुझे अधिक सोचने से रोक रही थी। मैं माँ या दोनों बाबू के लिए कुछ भी करने को तैयार था, बस वे खुश रह...
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