विचारों का कटाव
हम अपनी निजी जिंदगी में इस कदर व्यस्त हैं कि हमारा ध्यान समाज की उन्नति से हट जाता है | हम समाज से कटने लगते हैं | आप बोल सकते हैं कि इसमें आपका पूरा दोष नहीं है लेकिन हम इसके भागीदार तो जाने-अंजाने बन ही जाते हैं | मैं मानता हूँ कि हम सभी रोटी की तलाश में अपने घर से दूर किसी नए बसेरे में अपनी दुनिया बसाते हैं और इसकी सुरक्षा में दिन-रात बिता जाते हैं लेकिन हम जहाँ रहते हैं या हमारी पैदाइश जहाँ की होती है , हम धीरे-धीरे उनमें से किसी एक को चुनने लगते हैं | ऐसा बिल्कुल गलत भी नहीं है जब आपको इनमें से किसी एक को चुनना पड़े लेकिन जब बात अस्मिता की आती है , तब दिक्कत हो जाती है | आप द्वंद्व में पड़ जाते हैं कि किसे चुनूँ , उसे जहाँ मैं पैदा हुआ या जहाँ मेरा रोजगार है और अलबत्ता ये सबके साथ होता है और हम अंततः खाली हाथ ही रहते हैं | बड़े शहर के बड़े ख्यालों ने हमें बस इतना सिखाया है कि आप खुश रहना सीख जाओ , बाकी काम चलते रहेंगे | कभी-कभी किसी एक की नासमझी भी सबपर भारी पड़ जाती है और शायद इस कारण भी हम अपने हाथ पीछे खींच लेते हैं लेकिन हमें समझना होगा कि हम जिस समाज में रहते हैं वह ...