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हिंदीनुवाद: एक नया शब्द व प्रकल्प

मैं आज आपके साथ अपनी एक दुविधा साझा करूँगा क्योंकि मुझे लगता है कि अपनी बात साझा करने से मेरे मन का बोझ भी हल्का हो जाएगा और इस प्रकार मेरे पास समाधान की भी उम्मीद होगी और इसके साथ मैं आपसे यह भी उम्मीद करूँगा कि आपकी सकारात्मक टिप्पणियाँ मेरा ज्ञानवर्धन भी करेगी । मैं पिछले अप्रैल से एक प्रकल्प पर काम कर रहा हूँ और मैंने इसका नाम संकल्पनाकोष दिया है। इस प्रकल्प का उद्देश्य सॉफ्टवेर अनुवाद व हिंदीनुवाद (हिंदी + अनुवाद) से जुड़ी समस्याओं का समूल नाश करना है और इसके साथ एक प्रतिबद्धता भी है कि इस प्रकल्प के माध्यम से हिंदी का मानकीकरण भी हो सके। वैसे मानकीकरण कोई बच्चे का खेल नहीं है इसीलिए इसमें समय तो लग ही सकते हैं लेकिन मैं इसके लिए प्रतिबद्ध हूँ और मेरी दक्षता मुझे ऐसा करने को प्रेरित भी करती है। इस प्रकल्प में फिलहाल पंद्रह से भी अधिक विभाग हैं और इनमें सर्वमहत्वपूर्व है- संगणक विभाग और इसी के तहत मेरा सॉफ्टवेर अनुवाद का कार्य चल रहा है। मैंने इसे इस लायक बनाया है कि आप अपनी हिंदी में किसी भी सॉफ्टवेर का प्रयोग कर सकेंगे और आपकी किसी भाषाविशेष की अनभिज्ञता आपके मार्ग में रोड़ा...

तकनीकी प्रतिबद्धता

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हिंदी के प्रति हमारी प्रतिबद्धता हम कई बार अपने ही सवालों में उलझकर रह जाते हैं और उनमें से कईयों के जवाब तो हम ताउम्र ढूँढने में बिता देते हैं और कुछ तो इसी चक्कर में परलोक सिधार भी जाते हैं। हमारी सुप्रतिष्ठित भारत सरकार अबतक भारतीय भाषाओं को अव्वल स्थान दिलाने में नाकाम रही और वैश्वीकरण के इस मकड़जाल ने हमें इतना व्यस्त बना दिया कि हम अपनी भारतीय भाषाओं में उन तकनीकों का प्रयोग करना चाहते हैं। हम भले ही अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में पढ़ेंगे लेकिन तकनीकी व दैनिक कार्य हिंदी में करेंगे और बात कमाई की हो तो कहना क्या।।। हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्ता हमारा। आज जो लोग इन तकनीकी जगहों पर हमारी भाषाओं के लिए काम कर रहे हैं, उनमें से अधिकतर तो केवल बोली के रूप में उन भाषाओं को जानते हैं। उन्हें हमारी भाषाओं में तकनीकी ज्ञान हासिल नहीं है और इस कारण जब वे और उनकी तथाकथित समुदाय, चाहे वे किसी भी मंच पर हो, केवल कोरा अनुवाद कर रही है और इस कारण हमारी भाषाओं में अशुद्धियों का जाल बन गया है, जिसे हम चाहते हुए भी नहीं हटा पा रहे हैं। जो लोग सही जानते भी हैं, वे भी कुछ नहीं कर पा ...

ट्विटर की हिंदीत्रुटियाँ

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ट्विटर अनुप्रतीक मैं ट्विटर का नियमित प्रयोक्ता तो नहीं हूँ लेकिन मैं ट्विटर हिंदी में प्रयोग करता हूँ और पिछले तीन साल से मेरा यह नित्यकर्म बन गया है कि मैं ट्विटर पर हिंदीविशेष की प्रगति का गवाह रहूँ और बीच-बीच में समय मिलने पर उससे तकरीर भी कर ही लेता हूँ। मैं अभी कुछ घंटों पहले ट्विटर पर था और उसके हिंदी हेतु दिशानिर्देश पढ़ रहा था और मुझे बिल्कुल निराशा हाथ लगी कि इसके अनुवाद व नियमावली बिल्कुल घटिया दर्जे के थे। ऐसा भी नहीं है कि इसके पास काबिल लोग नहीं है लेकिन उनका भाषाविशेष का ज्ञान सीमित है और इस कारण ये त्रुटियाँ पैदा हुई। ये लोग शब्दकार तो बिल्कुल नहीं हैं।  मैं मानता हूँ कि हमारी देश की भाषाई विविधता भी इन त्रुटियों की वजह है लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि ट्विटर हिंदी में है और यहाँ <शुरुआत> ऐसे लिखा जाता है, नाकि ऐसे <शुरुवात> और एक कमाल की बात तो आपको बताना ही भूल गया कि यहाँ नोटिफिकेशन हेतु हिंदी में <अधिसूचना> लिया गया है लेकिन नोटिफिकेशन्स हेतु इसने <सूचनाएं> लिया है और यह एक बहुत बड़ी गलती है। इसका उत्तर <अधिसूचनाएँ> ह...

मौलिकता की कमी

अनुवाद में कुछ मौलिक समस्याएँ आ रही है , जिनका निदान संभव है , पर मैं उस मानसिकता का क्या करूँ , जो अंग्रेजी में हिंदी व अन्य भाषाओं के शब्दों को आसानी से बयाँ कर देता है किंतु जब मैं इसके उलट करने का प्रयास करता हूँ तो अधिकतर में असफलता ही हाथ लगती है |  मैं व्यवस्था को दोष नहीं दे सकता क्योंकि यह व्यवस्था हमारे लोगों द्वारा हमारे लिए ही बनाई गई है और इसे बदलने का समय आ गया है , लेकिन आगे कौन बढ़े और क्यों बढ़े | इन लोगों का कोई व्यक्तिगत फायदा भी नहीं है और हमारे भाषाओं की परवाह करना चप्पल खाने जैसा है | हमारी भाषाएँ केवल बोलने के लिए ही है और बाकी काम तो इन्हें दूसरे से चलाना होता है। हमारे सॉफ्टवेर अभियंता बहुत काबिल हैं और अब तो ये लोग बहुप्रतिष्ठित कंपनियों के कर्ताधर्ता बन चुके हैं , लेकिन उनकी काबिलियत कहाँ घास चरने चली जाती है जब एक देशी खोजी इंजन की बात उठाई जाती है | ये इतने काबिल हैं कि फेसबुक इन्हें हाथों - हाथ गोद में उठा लेती हैं लेकिन ये फेसबुक को टक्कर देने वाली कंपनी चलाने में अक्षम हैं | कुछ लोग हैं , जो इस उद्योग में दाँव लगा रहे हैं पर मुझे उनकी कर्तव्यन...

भूतिया लेखक

जब भी आप किसी फिल्म, लघुफिल्म, विज्ञापन, धारावाहिकों के किसी संवाद पर खुश होकर उसके लेखक को ढूँढते हैं तो आपको उससे जुड़े लेखक का नाम कार्यक्रम के आरंभ या अंत में दिखते हैं लेकिन क्या वाकई उसी इंसान ने वह संवाद लिखा है जिसपर आप इतनी हँसी-ठिठोली कर रहे होते हैं| हमारे देश में भाषाएँ जितनी समृद्ध हैं, उतना ही बड़ा इनका बाजार है लेकिन इनके रचयिता तो शुद्धतः गैर-भारतीय भाषिक होते हैं| वे निजी जिंदगी या व्यवसायिक क्रम में किसी भी भाषा का प्रयोग करते हो, लेकिन कैमरे के सामने तो उन्हें भारतीय भाषाओं से जुड़े शब्द, हावभाव ही दिखाना होता है| मसलन, मैं हिंदी की विशेष चर्चा करूँगा| हिंदी दुनिया की सर्वाधिक विज्ञप्रिय भाषा होने के साथ ही इसमें जो कला का समाविष्ट है, यही उसे दुनिया की सुंदर भाषा का ताज दिलाता है लेकिन इसके नामचीन जानकारों की कमी इसके अहम को चोट करती है और कभी-कभी इसके अहम के साथ समझौता भी हो जाता है और हम केवल देखने के बजाय कुछ भी नहीं कर पाते हैं| हिंदी के पास दुनिया का सबसे बड़ा बाजार मौजूद है जो भारत की वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की राह में एक मजबूत घटक साबित हो रही है| ...
यहाँ मानक हिंदी के संहितानुसार कुछ त्रुटियाँ हैं, जिन्हें सुधारने का काम प्रगति पर है। आपसे सकारात्मक सहयोग अपेक्षित है। अगर आप यहाँ किसी असुविधा से दो-चार होते हैं और उसकी सूचना हमें देना चाहते हैं, तो कृपया संपर्क प्रपत्र के जरिये अपनी व्यथा जाहिर कीजिये। हम यथाशीघ्र आपकी पृच्छा का उचित जवाब देने की चेष्टा करेंगे।