संदेश

विद्वतहिंदी लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं
कुमारवाणी पर आपका स्वागत है।

What does that mean: in search of my destiny…?

चित्र
यह आलेख मेरे लिंक्डइन मित्रों के लिये विशिष्टतः लिखा गया लेकिन इसकी व्यवहारिकता को देखते हुये इसे यहाँ भी प्रकाशित किया गया है। I  didn’t know what it was during writing that. I don’t know what it still is, I also don’t know what it must be or what it’s in the ideal world but I know what my destiny must be. According to me, Destiny is the last position that we want to get (once) in our life and that may not be achieved by the way we do prefer our works in our dailies but if you think that you are so important to your destiny that you cannot compromise with that and then, you make every possible ways that go to the point which leads to your destiny. We make changes to our schedules and report it according to the needed requirements and yes, I accept it that it takes time to achieve that but you know the taste of achieving that. I have just had some of that when I got my content (this) ready for being published before just pressing  Publish  button. ...

शब्दहीन

चित्र
आपमें से कितने हमारी भाषाओं से सुपरिचित हैं और कितने अभी भी कतार में हैं। आपने कभी ध्यान भी दिया है कि हमारी भाषाओं को शब्दहीनता की बीमारी हो गयी है। हमारी भाषाएँ, खासकर हिंदी को यह बीमारी ज्यादा घर लिया है और अब तो इसके निशान समाचार चैनल व अखबार से लेकर अंतर्जाल व हमारे दिल-ओ-दिमाग तक फैल गए हैं। हमारी भाषाओं को यह बीमारी किसी ने उधार में दिया है जिसे इसके कर्ताधर्ता जानबूझकर पाले बैठे हुए हैं और ये लोग शायद इस विषाणु को त्यागने के लिए तैयार नहीं हैं। हमारी भाषाओं के कर्ताधर्ता यह कब समझेंगे कि आधुनिक युग की हमारी भाषाओं के तारणहार वास्तविकतः यही हैं। इनके आलेख दुनिया के किसी भी हिस्से में सिर्फ एक टक (अंग्रेजी: क्लिक) से मिल जाती है और हमारी भाषाओं के रचनाकार आज भी किसी दान, याचना, इनाम, पुरस्कार आदि के मोहताज हैं। हमारी भाषाओं में वैसे भी शब्दों की कोई कमी नहीं है और हमारी भाषाएँ दुनियावी भाषाओं से अधिक समृद्ध है और हमारा विशाल इतिहास तो इससे पटा भरा है लेकिन इसके कर्ताधर्ता इस खजाने के दरवाजे पर कुंडी लगाए बैठे हैं। मैं यहाँ किसी पर भी इल्जाम लगाना नहीं चाहता हूँ लेक...

हिंदी या अंग्रेजी क्या चाहिए???

चित्र
आज हम सभी जानते हैं कि हिंदी में विज्ञानी शब्दों की कोई कमी नहीं है और नित नए हिंदी सजाल भी अंतर्जाल पर आ रहे हैं। इसके साथ भारत सरकार ने भी बकायदा हिंदी अंतर्जाल हेतु .भारत सहित 9 अनुक्षेत्रों को जारी कर दिया है। मेरा मानना है कि जब हम सभी भारतीय अपनी मातृभाषा हिंदी में शिक्षार्जन करेंगे, हमारे देश की तरक्की में वृद्धि जरूर होगी, क्योंकि ये तो हम सभी जानते हैं कि हमारे अधिसंख्य लोग अंग्रेजी नहीं जानते है और इसमें इनका कोई कसूर भी नहीं है। हमें अपनी भाषा में पढ़ने से जिस संस्कृति का भान होगा, वह विशुद्ध भारतीय ही होगी। यह भी पढ़ें: .भारत अनुक्षेत्र आज किसी गाँव में कोई ऐसा चिकित्सक नहीं मिलता, जो गाँववालों की सेवा करना चाहता हो, उसे तो सिर्फ पैसों से मतलब होता है, जो सिर्फ शहरों में ही संभव है। यद्यपि हमारी सरकार इनलोगों को अच्छी तनख्वाह देती है, लेकिन इनलोगों को तो अंग्रेजी शैली की जिंदगी पसंद है, जो उन्हें गाँवों में मिलने से रही। जब हम हिंदी में अपनी बात कहने में समर्थ है, तो फिर हमलोग एक विदेशज की सहायता क्यों लेते है। जब 1854 में लार्ड मैकाले व चार्ल्स वुड ने ...

हिंदी के रखवाले

चित्र
हिंदी के रखवाले यह शीर्षक थोड़ा अटपटा जरूर है लेकिन हम जिस युग में रह रहे है, उस युग के बिल्कुल माफिक है। हम विश्व के किसी भी कोने में हो, हम अपनी हिंदी को पीछे नहीं छोड़ पाते हैं। हम अपने देश को भूल जाना मंजूर कर लेते हैं लेकिन अपनी हिंदी को भूलना कतई मंजूर नहीं करते हैं और शायद यही हमारी विविधता की सबसे बड़ी शक्ति है। मैं इसमें हमारी सभी भारतीय भाषाओं को शामिल कर रहा हूँ क्योंकि हमारे लोग अमूमन दो भाषाएँ तो जानते ही हैं और कभी-कभी यही आँकड़ा पाँच-छः तक पहुँच जाता है। हम जब स्वयं को हिंदीभाषी के तौर पर खुद को पूरी दुनिया में परिभाषित करते हैं तब हम उस देश की तात्कालिक परिस्थिति का अनुसरण करते हुए ऐसा करते हैं। मैं मानता हूँ कि वैश्विक मानक उदारीकरण पश्चात् अधिक समझदार हो गए हैं और यही वजह है कि वैश्विक फलक पर हर किसी को पेश होने का मौका मिल जाता है। और जो सबसे योग्य होता है, उसे मंजूरी भी दी जाती है लेकिन हमारी हिंदी के साथ यह मामला जुदा है। हमारी हिंदी के पास सर्वाधिक वक्ता हैं लेकिन संयुक्त राष्ट्र (संरा) में इसकी वैधानिकता नहीं है। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि हमारी हिंदी संर...

हमारी बोलियाँ

क्या आपमें से कोई हमारी सभी भाषाओं को जानते हैं, उनकी बोलियों को जानते हैं। आज उनका व्याकरण जानना उतना जरूरी नहीं है, जितना उनके अस्तित्व को पहचानना। हममें से कई दो या अधिक भाषाएँ बोलकर ही संतुष्ट हो लेते हैं लेकिन शेष सत्रह सौ भाषाओं व उनकी बोलियों का क्या, उनका ख्याल कौन रखेगा। हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि हमारी भाषाएँ तो कभी भी किसी भी तालिका में नजर आ जाएँगी लेकिन हमारी बोलियाँ इस हालत में कभी भी नहीं होंगी कि वे अपनी अस्मिता भी बचा सके। आज भाषा और बोली का फर्क जानना जितना जरूरी है, उससे ज्यादा जरूरी उन्हें समझने की है। हमारी सभी बोलियाँ, चाहे वे पूर्वोत्तर, हिमाचल, पहाड़ी या दक्षिणी या पूर्वी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती हो, उन्हें सहेजकर रखना नितांत आवश्यक हो गया है। वैश्वीकरण के इस दौर ने हमें इतना तेज बना दिया है कि हम कई चीजों को पलटकर भी नहीं देख पाते हैं। हमें बहुत जल्दी हो जाती है, हम बेसब्र हो जाते हैं। किसी भी इम्तिहान की तैयारी व उसके परिणाम के बीच जितना अंतर होता है, यहाँ तो वह मिलीसकेंड में हो जाता है और शायद यही वजह है कि हम अधिक तेज हो गए हैं लेकिन हमार...

हिंदीनुवाद: एक नया शब्द व प्रकल्प

मैं आज आपके साथ अपनी एक दुविधा साझा करूँगा क्योंकि मुझे लगता है कि अपनी बात साझा करने से मेरे मन का बोझ भी हल्का हो जाएगा और इस प्रकार मेरे पास समाधान की भी उम्मीद होगी और इसके साथ मैं आपसे यह भी उम्मीद करूँगा कि आपकी सकारात्मक टिप्पणियाँ मेरा ज्ञानवर्धन भी करेगी । मैं पिछले अप्रैल से एक प्रकल्प पर काम कर रहा हूँ और मैंने इसका नाम संकल्पनाकोष दिया है। इस प्रकल्प का उद्देश्य सॉफ्टवेर अनुवाद व हिंदीनुवाद (हिंदी + अनुवाद) से जुड़ी समस्याओं का समूल नाश करना है और इसके साथ एक प्रतिबद्धता भी है कि इस प्रकल्प के माध्यम से हिंदी का मानकीकरण भी हो सके। वैसे मानकीकरण कोई बच्चे का खेल नहीं है इसीलिए इसमें समय तो लग ही सकते हैं लेकिन मैं इसके लिए प्रतिबद्ध हूँ और मेरी दक्षता मुझे ऐसा करने को प्रेरित भी करती है। इस प्रकल्प में फिलहाल पंद्रह से भी अधिक विभाग हैं और इनमें सर्वमहत्वपूर्व है- संगणक विभाग और इसी के तहत मेरा सॉफ्टवेर अनुवाद का कार्य चल रहा है। मैंने इसे इस लायक बनाया है कि आप अपनी हिंदी में किसी भी सॉफ्टवेर का प्रयोग कर सकेंगे और आपकी किसी भाषाविशेष की अनभिज्ञता आपके मार्ग में रोड़ा...

तकनीकी प्रतिबद्धता

चित्र
हिंदी के प्रति हमारी प्रतिबद्धता हम कई बार अपने ही सवालों में उलझकर रह जाते हैं और उनमें से कईयों के जवाब तो हम ताउम्र ढूँढने में बिता देते हैं और कुछ तो इसी चक्कर में परलोक सिधार भी जाते हैं। हमारी सुप्रतिष्ठित भारत सरकार अबतक भारतीय भाषाओं को अव्वल स्थान दिलाने में नाकाम रही और वैश्वीकरण के इस मकड़जाल ने हमें इतना व्यस्त बना दिया कि हम अपनी भारतीय भाषाओं में उन तकनीकों का प्रयोग करना चाहते हैं। हम भले ही अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में पढ़ेंगे लेकिन तकनीकी व दैनिक कार्य हिंदी में करेंगे और बात कमाई की हो तो कहना क्या।।। हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्ता हमारा। आज जो लोग इन तकनीकी जगहों पर हमारी भाषाओं के लिए काम कर रहे हैं, उनमें से अधिकतर तो केवल बोली के रूप में उन भाषाओं को जानते हैं। उन्हें हमारी भाषाओं में तकनीकी ज्ञान हासिल नहीं है और इस कारण जब वे और उनकी तथाकथित समुदाय, चाहे वे किसी भी मंच पर हो, केवल कोरा अनुवाद कर रही है और इस कारण हमारी भाषाओं में अशुद्धियों का जाल बन गया है, जिसे हम चाहते हुए भी नहीं हटा पा रहे हैं। जो लोग सही जानते भी हैं, वे भी कुछ नहीं कर पा ...
यहाँ मानक हिंदी के संहितानुसार कुछ त्रुटियाँ हैं, जिन्हें सुधारने का काम प्रगति पर है। आपसे सकारात्मक सहयोग अपेक्षित है। अगर आप यहाँ किसी असुविधा से दो-चार होते हैं और उसकी सूचना हमें देना चाहते हैं, तो कृपया संपर्क प्रपत्र के जरिये अपनी व्यथा जाहिर कीजिये। हम यथाशीघ्र आपकी पृच्छा का उचित जवाब देने की चेष्टा करेंगे।